Image Credit : Generated By Grok
कभी जिन नदियों के किनारे गाँव बसे, खेत लहलहाए और सभ्यताएँ पलीं—
आज वही नदियाँ रेत की खामोश लकीरों में बदलती जा रही हैं।
दुनिया की सबसे लंबी नदियों में से दो-तिहाई अब स्वतंत्र रूप से नहीं बह रही हैं (मुख्यतः बांधों और मानवीय हस्तक्षेप के कारण; स्रोत: Nature पत्रिका अध्ययन, 2019)। भारत इस संकट का एक प्रमुख उदाहरण है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन एक कारक है, लेकिन मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियाँ जैसे बांध निर्माण, अधिक दोहन, प्रदूषण और भूजल निकासी नदियों के सूखने की प्रमुख वजहें हैं (स्रोत: Nature अध्ययन)।
राजस्थान की जोजरी नदी कभी जोधपुर के लिए पीने और खेती का मुख्य स्रोत थी। आज इसमें औद्योगिक अपशिष्ट की मात्रा सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाई जाती है।
एक अध्ययन के अनुसार, जोजरी नदी में भारी धातुएँ (जैसे लेड और कैडमियम) WHO की तय सीमा से कई गुना अधिक दर्ज की गई हैं (स्रोत: Mongabay India)।
हैदराबाद की मूसी नदी में प्रतिदिन लगभग 600-1200 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज डाला जाता है (स्रोत: CPCB रिपोर्ट्स)।
यह नदी नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता प्रदूषण का नाला बन चुकी है।
भारत में हर साल करोड़ों टन रेत अवैध रूप से निकाली जाती है।
रेत खनन से:
पलार नदी इसका जीवित उदाहरण है (स्रोत: Yale E360)।
बिहार में 40 से अधिक नदियाँ सूख चुकी हैं या मौसमी हो गई हैं (स्रोत: DownToEarth)।
हिमालयी क्षेत्र में लगभग 50% से अधिक प्राकृतिक जलस्रोत (springs) सूख चुके हैं या कमजोर हो चुके हैं (स्रोत: NITI आयोग रिपोर्ट, 2018)।
जब स्रोत खत्म होते हैं, तो नदी केवल नक्शे में बचती है।
नदियाँ अपने आप नहीं मरतीं—
उन्हें हम मारते हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट (2018) के अनुसार, 2030 तक भारत की 40% आबादी को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है (स्रोत: NITI Aayog)।
अगर हमने नदियों को लौटाना नहीं सीखा, तो आने वाली पीढ़ियों को हम केवल सूखी धाराएँ सौंपेंगे।
नदियाँ बचेंगी, तभी भविष्य बहेगा।