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हसदेव अरण्ड (Hasdeo Arand) छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा सघन वन क्षेत्र है, जो लगभग 170,000 हेक्टेयर में फैला हुआ है। इसे मध्य भारत की सबसे बड़ी अविभाजित वन श्रृंखला माना जाता है और "छत्तीसगढ़ के फेफड़े" कहा जाता है। यहां साल, सागौन और अन्य घने जंगल हैं, जो जैव विविधता का खजाना हैं। यह क्षेत्र महत्वपूर्ण हाथी गलियारा (Elephant Corridor) भी है, जहां भारतीय हाथी, तेंदुआ, सुस्त भालू (Sloth Bear), विभिन्न पक्षी और दुर्लभ वनस्पतियां पाई जाती हैं। गोंड जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से यहां रहते हैं और वन पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं।
हसदेव अरण्ड में 82 पक्षी प्रजातियां, 167 प्रकार की औषधीय वनस्पतियां और कई लुप्तप्राय जीव पाए जाते हैं। यह लेमरू हाथी रिजर्व का हिस्सा है और हाथियों के लिए महत्वपूर्ण कॉरिडोर है। आदिवासी यहां महुआ, तेंदू पत्ता, चार बीज आदि एकत्र कर जीवन यापन करते हैं। वन उनके सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का केंद्र है।
हसदेव अरण्ड के नीचे बड़ा कोयला भंडार है – प्रमाणित 1.369 अरब टन और अनुमानित 5.179 अरब टन। यहां 23 कोयला ब्लॉक हैं। 2010 में केंद्र सरकार ने इसे "नो-गो" क्षेत्र घोषित किया, लेकिन बाद में अनुमति दी गई। पारसा ईस्ट और कांटा बसन (PEKB) ब्लॉक आदानी ग्रुप द्वारा संचालित है, जो राजस्थान की बिजली के लिए कोयला निकालता है।
खनन से लाखों पेड़ कटे, गांव विस्थापित हुए और जल स्रोत प्रभावित हुए। आदिवासियों ने "हसदेव अरण्ड बचाओ संघर्ष समिति" बनाकर विरोध किया – 300 किमी पैदल मार्च, पेड़ों से चिपककर विरोध आदि। 2022 में छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सभी ब्लॉकों को रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया, लेकिन खनन जारी रहा।
2025 में खनन विस्तार जारी रहा। जुलाई 2025 में छत्तीसगढ़ वन विभाग ने केंटे एक्सटेंशन ब्लॉक के लिए 1,742 हेक्टेयर घने वन को डाइवर्ट करने की सिफारिश की। PEKB माइन में लाखों पेड़ कटे, जिसमें 3.68 लाख पेड़ प्रभावित होने की बात सामने आई। दिसंबर 2025 में विधानसभा में बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई के आरोप लगे और विरोध प्रदर्शन हुए। कुछ जगहों पर विरोध हिंसक भी हुआ। पर्यावरण कार्यकर्ता अलोक शुक्ला (गोल्डमैन पुरस्कार विजेता) और आदिवासी लगातार संघर्ष कर रहे हैं। यह विकास बनाम पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों का बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
यह लेख सूचनात्मक उद्देश्य से है। नवीनतम जानकारी के लिए स्रोत देखें। (अपडेट: जनवरी 2026)