जिस मोर को हमने सम्मान का प्रतीक बनाया, उसी के लिए हमने जीने की जगह नहीं छोड़ी
भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर (Pavo cristatus) सदियों से हमारी संस्कृति, कला, साहित्य और धर्म का अभिन्न अंग रहा है। भगवान कार्तिकेय का वाहन होने से लेकर भगवान कृष्ण के मुकुट में सजे मोर पंख, बारिश के मौसम में नाचते मोर की सुंदरता, और लोकगीतों में "मोर नाचे" जैसी पंक्तियां – मोर हमारे गर्व और सम्मान का प्रतीक है। 1963 में मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया, क्योंकि यह सुंदरता, गरिमा और प्रकृति से गहरा जुड़ाव दर्शाता है। लेकिन आज वही मोर, जिसे हमने इतना ऊंचा स्थान दिया, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। विकास के नाम पर जंगलों की कटाई, शहरीकरण, खेती का विस्तार और मानवीय गतिविधियों ने मोर के लिए जीने की जगह लगभग खत्म कर दी है।
मोर का सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व
मोर न सिर्फ सुंदरता का प्रतीक है, बल्कि पारिस्थितिकी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कीटभक्षी पक्षी है जो टिड्डियों, टिड्डी, सांपों के छोटे बच्चे, कीड़े और छोटे सरीसृपों को खाकर फसलों को नुकसान से बचाता है। मोर के नाच में फैलने वाली पूंछ (ट्रेन) में 100-150 तक आंख जैसी डिजाइन होती हैं, जो प्रकृति की सबसे खूबसूरत कला मानी जाती है। मादा मोर (पिउन) कम रंगीन होती है, लेकिन वह घोंसले की देखभाल और बच्चों की परवरिश में बहुत सक्षम होती है। मोर का नाच मुख्य रूप से बारिश के मौसम में होता है, जो प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को दर्शाता है।
मोर के सामने मुख्य चुनौतियां – विस्तार से समझें
- आवास हानि और विखंडन (Habitat Loss & Fragmentation)
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, सड़क निर्माण, औद्योगिक क्षेत्र और खेती के विस्तार ने मोर के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है। मोर को घने जंगल, ऊंचे पेड़ (रोosting के लिए), घास के मैदान और पानी के स्रोतों की जरूरत होती है। लेकिन गांवों के आसपास पेड़ कट रहे हैं, जंगल साफ हो रहे हैं, और मोर अब सिर्फ छोटे-छोटे टुकड़ों में बचे हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में जहां पहले मोर की अच्छी संख्या थी, वहां अब संख्या तेजी से घट रही है। - शिकार और अवैध व्यापार
मोर के पंखों की मांग (सजावट, हस्तशिल्प और धार्मिक उपयोग के लिए) अभी भी बनी हुई है। अवैध रूप से मोर के पंख इकट्ठा करना, मांस के लिए शिकार और जीवित मोर की तस्करी एक बड़ा खतरा है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत मोर अनुसूची-I में है, लेकिन कानून का पालन कमजोर होने से शिकार रुक नहीं पा रहा। - कीटनाशकों और दूषित भोजन
खेती में इस्तेमाल होने वाले जहरीले कीटनाशक (जैसे कार्बोफ्यूरान, फोरेट आदि) से मोर दूषित बीज और कीड़े खाकर मर जाते हैं। यह समस्या खासकर उत्तर भारत और पश्चिमी राज्यों में ज्यादा है। - मानवीय संघर्ष और अन्य कारक
सड़कों पर मोरों का दुर्घटनाग्रस्त होना, कुत्तों और बिल्लियों से खतरा, और जलवायु परिवर्तन से बारिश के पैटर्न में बदलाव भी मोर के प्रजनन को प्रभावित कर रहा है।
क्षेत्रीय स्थिति – कहां सबसे ज्यादा खतरा?
राजस्थान और गुजरात में मोर की अच्छी संख्या बची है, क्योंकि वहां गांवों में मोरों को पूजा जाता है और लोग उन्हें सुरक्षा देते हैं (बिश्नोई और अन्य समुदाय)। लेकिन उत्तर प्रदेश (प्रयागराज, वाराणसी, लखनऊ क्षेत्र) और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में संख्या बहुत कम हो गई है। हाल के सर्वेक्षणों (2024-2025) के अनुसार, कई इलाकों में मोर अब सिर्फ 20-30% रह गए हैं।
संरक्षण के प्रयास – क्या हो रहा है और क्या करना चाहिए?
भारत सरकार ने मोर को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-I में रखा है, जिससे शिकार पर सख्त सजा है। राष्ट्रीय उद्यान जैसे रणथंभौर, सरिस्का, केवलादेव (भरतपुर), गिर और पेंच में मोर की अच्छी सुरक्षा है। कई एनजीओ और स्थानीय समुदाय मोर संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन ज्यादा जरूरी है:
- ग्रामीण क्षेत्रों में ऊंचे पेड़ों का रोपण और संरक्षण।
- कीटनाशकों के सुरक्षित उपयोग पर जागरूकता और विकल्प।
- शिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई।
- स्कूलों और समुदायों में मोर संरक्षण की शिक्षा।
- सतत विकास मॉडल जहां इंसान और मोर साथ रह सकें।
निष्कर्ष – हमारी जिम्मेदारी
मोर सिर्फ एक पक्षी नहीं है – यह हमारी संस्कृति, पर्यावरण और नैतिकता का प्रतीक है। अगर हमने इसे सम्मान दिया है, तो अब उसे बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी है। जंगलों को बचाना, पेड़ लगाना, शिकार रोकना और जागरूकता फैलाना – ये छोटे-छोटे कदम मोर के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। क्योंकि अगर मोर का नाच बंद हो गया, तो बारिश की खुशी भी अधूरी लगेगी। आइए मिलकर यह सुनिश्चित करें कि आने वाली पीढ़ियां मोर को सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि खुले आसमान में नाचते देख सकें।