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उत्तराखंड का जोशीमठ…
जहाँ कभी मंदिरों की घंटियाँ और पहाड़ों की शांति गूंजती थी,
आज वहाँ दरारों की आवाज़ सुनाई देती है।
यह केवल एक कस्बे की कहानी नहीं है—
यह हिमालय की उस चुप चेतावनी की आवाज़ है, जिसे हमने सालों तक अनसुना किया।
जोशीमठ चमोली ज़िले में, लगभग 1,890 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
यह बद्रीनाथ धाम का प्रवेश द्वार है और आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिर्मठ का केंद्र।
धार्मिक, सामरिक और भौगोलिक—तीनों दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है।
2022–23 में जोशीमठ के सैकड़ों घरों, सड़कों और मंदिरों में गहरी दरारें दिखने लगीं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, जोशीमठ एक प्राचीन landslide debris पर बसा हुआ है—
यानी यह इलाका ठोस चट्टान नहीं, बल्कि ढीले मलबे पर टिका है।
1976 की मिश्रा समिति रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी थी। ISRO रिपोर्ट (2023): सिर्फ 12 दिनों में 5.4 cm subsidence।
बड़े होटल, चौड़ी सड़कें, सुरंगें और जलविद्युत परियोजनाएँ बिना पहाड़ की सहनशक्ति सोचे बनाई गईं। NTPC की तपोवन-विष्णुगढ़ परियोजना पर आरोप (हालांकि NTPC इनकार करता है)।
बारिश और पाइपलाइन का पानी मलबे में समाकर फिसलन पैदा करता है। खराब ड्रेनेज मुख्य कारण।
हिमालय सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है, हर साल मिलीमीटर खिसकता है, Zone V में।
लोगों को घर छोड़ने पड़े, मंदिरों में ताले लगे, पीढ़ियों का जीवन उजड़ा।
अगर विकास मॉडल नहीं बदला तो मसूरी, नैनीताल आदि भी खतरे में। 2025 तक subsidence जारी (DownToEarth रिपोर्ट)।
सच्ची प्रगति वही है जो विज्ञान और प्रकृति—दोनों के साथ चले।
पहाड़ चुप रहते हैं… लेकिन सहते नहीं।
जोशीमठ हमें याद दिलाता है कि अगर हमने हिमालय को नहीं बचाया, तो हिमालय हमें बचाने नहीं आएगा।